भोपाल

शारदीय नवरात्र 2020: मां पार्वती का लगाया ये वृक्ष, प्राचीन 4 पवित्र वृक्षों में से है एक

पूर्व में पेड़ को कटवा दिए जाने के बावजूद लोहे की चादर में तक छेद करके पुन: बाहर निकल आई थी शाखाएं…

सनातन धर्म में मनुष्य ही नहीं बल्कि नदी व वृक्षों को तक पूजित माना गया है। भारत में बहुत सी धार्मिक मान्यताएं हैं, जो देवी देवताओं के इस धरती से जुड़ाव को बताती हैं। वहीं धर्म शास्त्रों में देवी-देवताओं के द्वारा किए गए बहुत से कामों का उल्लेख भी मौजूद है। जिनके प्रमाण आज भी कई जगहों पर मौजूद हैं।

इन्हें कार्यों में से एक के संबंध में पुराणों और धार्मिक ग्रंथों में कहा गया है कि माता पार्वती ने इस धरती में कई वृक्ष कई स्थानों पर लगाए थे, जिनमें से कुछ वृक्ष आज भी सुरक्षित हैं। ऐसे में शारदीय नवरात्र शुरु होने से ठीक पहलते इन्हीं में से एक वृक्ष जो आज भी मौजूद है, उसके बारे में हम आपको बताने जा रहे हैं…

मान्यता के अनुसार माता पार्वती ने उज्जैन में क्षिप्रा के तट पर एक बरगद लगाया था जिसे सिद्धवट कहा जाता है। स्कंद पुराण अनुसार पार्वती माता द्वारा लगाए गए इस वट की शिव के रूप में पूजा होती है। उज्जैन के भैरवगढ़ के पूर्व में शिप्रा के तट पर प्रचीन सिद्धवट का स्थान है। इसे शक्तिभेद तीर्थ के नाम से भी जाना जाता है।

सिद्धवट उज्जैन के पवित्र शहर में स्थित है। इस जगह के पास ही शिप्रा नदी बहती है। इस जगह को इसकी पवित्रता के कारण प्रयाग का अक्षयवट कहा जाता है। यहां आने पर आप शिप्रा नदी में प्रचुर मात्रा में कछुए भी देखे जाते हैं।

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दरअसल सिद्धवट घाट अंतिम संस्कार के बाद की प्रक्रियाओं के लिए प्रसिद्ध है। देश भर से सैकड़ों लोग संस्कार कर्म करने के लिए सालभर यहां आते रहते हैं। पुराणों में भी इस जगह को प्रेत-शिला-तीर्थ कहा गया है। स्थानीय लोगों का मानना है कि देवी पार्वती ने इस जगह पर तपस्या की थी।

लोहे की चादर में तक छेद करके बाहर निकल आई थी बरगद की शाखाएं…

एक किंवदंती के अनुसार पूर्व में यह पेड़ काट दिया गया और पूरा इलाका लोहे की चादरों से ढक दिया गया था, लेकिन इसके बावजूद बरगद की शाखाएं पुन: लोहे की चादर में छेद करके बाहर निकल आई थी। उस दिन से, स्थानीय लोग इस जगह को पवित्र मानते है। नाथ संप्रदाय के लोग इस जगह पर पूजा भी करते हैं।

जानें कहां कहां है ऐसे वृक्ष…

हिंदू मान्यता अनुसार संसार में केवल चार ही पवित्र वट वृक्ष हैं। प्रयाग (इलाहाबाद) में अक्षयवट, मथुरा-वृंदावन में वंशीवट, गया में गयावट जिसे बौधवट भी कहा जाता है और उज्जैन का पवित्र सिद्धवट हैं।

हिंदू मान्यता अनुसार इन चार प्राचीन वट वृक्षों में से एक यह उज्जैन का पवित्र सिद्धवट है। वहीं नासिक के पंचववटी क्षेत्र में सीता माता की गुफा के पास पांच प्राचीन वृक्ष है जिन्हें पंचवट के नाम से जाना जाता है। वनवानस के दौरान राम, लक्ष्मण और सीता ने यहां कुछ समय बिताया था।

मुगल काल में इन सभी वृक्षों को खत्म करने के कई प्रयास हुए, लेकिन इन्हें खत्म नहीं किया जा सका। कहते हैं कि पार्वती के पुत्र कार्तिक स्वामी को सिद्धवट के स्थान पर ही सेनापति नियुक्त किया गया था। यहीं उन्होंने तारकासुर का वध भी किया था।

तीन तरह की सिद्धि …

उज्जैन के पवित्र सिद्धवट तीन तरह की सिद्धि प्रदान करते हैं – संतति, संपत्ति और सद्‍गति। तीनों की प्राप्ति के लिए यहां पूजन किया जाता है। सद्‍गति अर्थात पितरों के लिए अनुष्ठान किया जाता है। संपत्ति अर्थात लक्ष्मी कार्य के लिए वृक्ष पर रक्षा सूत्र बांधा जाता है और संतति अर्थात पुत्र की प्राप्ति के लिए उल्टा सातिया (स्वस्विक) बनाया जाता है। यह वृक्ष तीनों प्रकार की सिद्धि देता है इसीलिए इसे सिद्धवट कहा जाता है। स्थानीय लोगों का मानना है कि देवी पार्वती ने इस जगह पर तपस्या की थी। स्कंद पुराण में इसको कल्पवृक्ष भी कहा गया है। वहीं यह पितृमोक्ष का तीर्थ भी बताया गया है।

यहां पर नागबलि, नारायण बलि-विधान का विशेष महत्व है। संपत्ति, संतित और सद्‍गति की सिद्धि के कार्य होते हैं। यहां पर कालसर्प शांति का भी विशेष महत्व है, इसीलिए कालसर्प दोष की भी पूजा होती है। वर्तमान में इस सिद्धवट को कर्मकांड, मोक्षकर्म, पिंडदान, कालसर्प दोष पूजा एवं अंत्येष्टि के लिए प्रमुख स्थान माना जाता है।

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देवी मां पार्वति ने की थी तपस्या…

बताया जाता है कि स्कंद पुराण अनुसार पार्वती माता द्वारा लगाए गए, उज्जैन के इस वट की शिव के रूप में पूजा होती है। मां पार्वती ने शिव को पतिरूप में पाने के लिए यहीं पर इस वृक्ष को लगाकर तपस्या की थी। माता की तपस्या से प्रसन्न होकर शिव ने प्रकट होकर पार्वती माता को पत्नी रूप में स्वीकार ही नहीं किया बल्कि यह वरदान भी दिया कि जो कोई इस वटवृक्ष पर दूध चढ़ाएगा उसे मेरा आशीर्वाद मिलेगा और उसके पितरों को मोक्ष की प्राप्ति होगी। कहते हैं कि तारकासुर के वध के लिए इसी वट के नीचे पार्वती के पुत्र कार्तिक स्वामी ने घोर तप किया और फिर उन्हें यहीं पर सेनापति नियुक्त किया गया था। बाद में इस वटवृक्ष के भगवान शिव से सिद्धवट घोषित कर उसके युगों युगों तक बने रहने का वरदान दिया।

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