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“धर्मपाल : भारतीय शिक्षा को पुन: खोजने वाले इतिहासकार” पर अन्तर्राष्ट्रीय वेबीनार 24 अक्टूबर को

 

भोपाल : गुरूवार, अक्टूबर 22, 2020, 16:53 IST

विख्यात गांधीवादी विचारक एवं इतिहासकार धर्मपाल की पुण्य तिथि पर 24 अक्टूबर को सुबह 11 बजे से अन्तर्राष्ट्रीय वेबीनार आयोजित किया जायेगा। वेबीनार का विषय ‘धर्मपाल : भारतीय शिक्षा को पुन: खोजने वाले इतिहासकार’ होगा।

संस्कृति विभाग, स्वराज संस्थान एवं धर्मपाल शौधपीठ भोपाल के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित अंतर्राष्ट्रीय वेबीनार में पर्यटन संस्कृति एवं अध्यात्म मंत्री सुश्री उषा ठाकुर मुख्य अतिथि होंगी। वेबीनार में अधिष्ठाता गांधी शोध प्रतिष्ठान जलगांव ‘श्री धर्मपाल का जीवन और उनके कार्य’ विषय पर वक्तव्य देंगी। इसके साथ ही वक्ता भारतीय इतिहास, संस्कृति एवं दर्शन के शोधार्थी डॉ. अंकुर कक्कड़ ‘क्या धर्मपाल द्वारा रचित ‘द ब्यूटीफुल ट्री’ हमें नई शिक्षा नीति लागू करने में सहायक हो सकती है ‘विषय पर वक्तव्य देंगे। प्रमुख सचिव संस्कृति, पर्यटन एवं जनसम्पर्क श्री शिव शेखर शुक्ला ने कहा है कि इच्छुकजन वेबीनार में लिंक ‘Meet.google.com/odv-nwwc-opg के माध्यम से जुड़ सकते हैं। उन्होंने सभी को सादर आमंत्रित किया है। वेबीनार का लाइव प्रसारण mp culture department, radioazadhind, mpculturebpl और mptribalmusum/page के सोशल मीडिया प्लेटफार्म पर होगा।

धर्मपाल : भारतीय शिक्षा को पुन: खोजने वाले इतिहासकार

धर्मपाल (1992-2006) एक गांधीवादी विचारक और इतिहासकार थे, जिनके अग्रणी कार्य ने भारतीय शिक्षा, राजनीति और सामाजिक संरचनाओं की औपनिवेशिक कथा को चुनौती दी और खारिज कर दिया। धर्मपाल ने 1964 में अपना अध्ययन शुरू किया और भारतीय समाज के एक विशाल कोष का अनावरण किया। धर्मपाल का शोध जो मुख्य रूप से ब्रिटिश लाइब्रेरी और इंग्लैंड और भारत के अन्य अभिलेखागार में किया गया था, ‘द ब्यूटीफुल ट्री’ सहित विभिन्न मौलिक प्रकाशनों के रूप में प्रकाशित किया गया। ‘द ब्यूटीफुल ट्री’ अठारहवीं और उन्नीसवीं शताब्दी की शुरूआत में भारत में शिक्षा प्रणाली का वर्णन करती हैं। धर्मपाल के मौलिक योगदानों में से एक यह था कि उनके काम ने ब्रिटिश शासन से पूर्व भारतीय समाज की एक अच्छी तरह से प्रलेखित तस्वीर पेश की। हमारे अतीत का पुनर्मूल्यांकन करने के इस प्रयास के साथ ही इस सम्मेलन का उद्देश्य धर्मपाल के काम और विशेष रूप से भारतीय शिक्षा के इतिहास में उनके स्थायी योगदान पर चर्चा करना है।


राजेश पाण्डेय

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