मुरैना
विधान सभा चुनाव की तारीख़ का एलान होते ही मुरैना में भी चुनावी सरगर्मी है. मुरैना में 6 विधान सभा सीट हैं. वैसे तो पूरे प्रदेश में बीजेपी-कांग्रेस का मुकाबला है, लेकिन यहां इन दोनों दलों का ज़ायका बीएसपी बिगाड़ती है.

आंकड़ों के हिसाब से भी देखें तो ज़िले के सभी विधान सभा क्षेत्रों में बीएसपी का अच्छा खासा प्रभाव है. पिछले चुनाव में 6 में से 2 विधान सभा सीट अम्बाह और दिमनी बीएसपी के कब्ज़े में गयीं और मुरैना, सुमावली, जौरा और सबलगढ़ बीजेपी के खाते में हैं. कांग्रेस का तो खाता तक नहीं खुल पाया था.

प्रदेश के स्वास्थ्य मंत्री रुस्तम सिंह इसी मुरैना विधान सभा क्षेत्र से चुनकर भोपाल गए. खुद रुस्तम सिंह भी कबूलते हैं कि चंबल और रीवा बेल्ट में बीएसपी का जनाधार अधिक है. लेकिन पिछले साल उत्तर प्रदेश विधान सभा चुनाव में बीएसपी के सफाए के बाद उन्हें उम्मीद है कि मध्य प्रदेश में भी हवा बदलेगी और दलित वोट भाजपा को मिलेंगे.

पिछले चुनाव में खुद रुस्तम सिंह महज 1700 वोट से जीत पाए थे. बीएसपी के रामप्रकाश राजोरिया ने उन्हें कड़ी टक्कर दी थी. 2008 में रुस्तम सिंह बीएसपी से 7 हजार मतों से हारे थे. बीएसपी के परशुराम मुदगल चुनाव जीते थे. अंबाह और दिमनी में भी बीएसपी का कब्जा है.

कांग्रेस की बात करें तो कांग्रेस इस बार सत्ता परिवर्तन का सपना देख रही है. उसे पूरा विश्वास है कि बीएसपी का दलित वोट बैंक जान चुका है कि प्रदेश में सिर्फ बीजेपी और कांग्रेस ही सरकार बना सकती है, इसलिए इस बार वो कांग्रेस के साथ आएंगे. वो तो 6 सीट में से 5 सीट जीतने का दावा कर रही है. हालांकि कांग्रेस के लिए सबसे बड़ी चुनौती उसकी खुद की गुटबाज़ी है. दिग्विजय सिंह, ज्योतिरादित्य सिंधिया और कमलनाथ के खेमे में बंटी कांग्रेस यहां अपना खाता खोल ले यही बड़ी बात है.

बीएसपी के लिहाज से मुरैना विधान सभा पिछले कुछ वर्षों से काफी अच्छा रहा है. 2008 में 6 में 2 सीट मुरैना और जौरा बीएसपी के पास थीं तो 2013 में भाजपा का गढ़ कही जाने वाली अम्वाह औ दिमनी दोनी सीटों पर बीएसपी ने परचम लहराया. देखा जाए तो जिले में बीएसपी ने भाजपा के गढ़ में सेंध लगाकर भाजपा को कमजोर किया. बीएसपी को उम्मीद है कि इस बार वो सवर्ण और दलित आंदोलन के काऱण यहां की सभी 6 सीटें जीत लेगी.

दो विधान सभा क्षेत्रों में जीत और 4 में वो दूसरे नंबर पर रही. सीधे तौर पर ये बीजेपी को चुनौती है. भाजपा 2013 के घोषणा पत्र में ज़िले के लिए किए गए अपने वादे पूरे नहीं कर पायी है. कांग्रेस से तो जनता पहले से ही नाराज़ है, अब बीजेपी को भी वो सबक सिखाने के मूड में है.

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