नवरात्र के दूसरे दिन यानी द्वितीया को मां दुर्गा के ब्रह्मचारिणी स्‍वरूप की पूजा की जाती है। ब्रह्म का अर्थ है तपस्‍या और चारिणी का अर्थ है आचरण करने वाली। यानी तप का आचरण करने वाली मां ब्रह्मचारिणी देवी। मां के दाएं हाथ में जप माला और बाएं हाथ में कमंडल शोभायमान है। मां दुर्गा के इस स्‍वरूप की उपासना करने से मनुष्‍य को भक्ति और सिद्धि दोनों की प्राप्ति होती है। देवी प्रसन्‍न होकर अपने भक्‍तों को तप, त्‍याग, वैराग्‍य, सदाचार और संयम प्रदान करती हैं।


सूर्योदय से पूर्व उठकर स्‍नान करें और मां ब्रह्मचारिणी की पूजा करें। सर्वप्रथम मां को दूध, दही, घी, इत्र, मधु व शर्करा से स्नान कराएं। उसके बाद फूल, अक्षत, रोली, चंदन, मिश्री, लौंग, इलाइची आदि अर्पित करें। मां ब्रह्मचारिणी को दूध और दूध से बने व्‍यंजन अति प्रिय होते हैं। इसलिए आप उन्‍हें दूध से बने व्‍यंजनों का भोग लगा सकते हैं।

या देवी सर्वभूतेषु मां ब्रह्मचारिणी रूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः।।
दधाना कर मद्माभ्याम अक्षमाला कमण्डलू।
देवी प्रसीदतु मयि ब्रह्मचारिण्यनुत्तमा।।

मां ब्रह्मचारिणी से जुड़ी एक कथा बहुत ही प्रचलित है। पूर्वजन्‍म में मां ब्रह्मचारिणी ने पुत्री के रूप में हिमालय के घर में जन्‍म लिया और नारदजी के कहने पर भगवान शंकर को पति के रूप में प्राप्‍त करने के लिए घोर तपस्‍या करने जंगल में चली गईं।

हजारों वर्षों तक देवी ने कड़ी तपस्‍या की और अन्‍न त्‍यागकर केवल जंगल के फल-फूल और बिल्‍व पत्र खाए। कुछ समय बाद उन्‍होंने बिल्‍व पत्र भी खाना छोड़ दिया और निर्जल और निराहार होकर तपस्‍या करती रहीं।


सभी देवतागण ऋषि और मुनियों ने उनसे प्रसन्‍न होकर उन्‍हें शिवजी को पति के रूप में प्राप्‍त करने का वरदान दिया। तब उनके पिता ने उन्‍हें तपस्‍या छोड़ने को कहा और उन्‍हें वापस लेने को पहुंचे। देवी ब्रह्मचारिणी की पूजा से सुख, शांति और धर्म की प्राप्ति होती है। विवाह में आने वाली बाधाएं भी दूर होती है।

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