नई दिल्ली 
होम मिनिस्टर राजनाथ सिंह हाल ही में कश्मीर गए। वहां के बाशिंदों के बीच नए सिरे से रिश्ते शुरू करने का संकेत देने की कोशिश की। अपने दौरे में राजनाथ ने कश्मीरियत को काफी अहमियत दी। घाटी में बढ़ी हिंसा के बीच केंद्र सरकार ने रमजान के दौरान आतंकियों के खिलाफ कार्रवाई को रोकने का फैसला लिया। अब जिस अंदाज में राजनाथ ने घाटी में युवाओं तक नरम अप्रोच के साथ कनेक्ट करने की कोशिश की, उससे केंद्र के मौजूदा सख्त रणनीति में बड़े बदलाव के संकेत दिखे। इससे पहले पीएम मोदी ने भी कश्मीर का दौरा कर वहां युवाओं से नरमी के साथ कनेक्ट करने की कोशिश की थी। इसे मोदी सरकार के रुख में नरमी आने का संकेत भी माना गया। सवाल उठ रहे हैं कि बदले हुए रुख के पीछे वजह क्या है? 
 

युवाओं की नाराजगी के बीच गुमराह होने के मामले बढ़े 
दरअसल, हाल के दिनों में तमाम सख्ती के बावजूद घाटी में सरकार को आतंकियों पर नियंत्रण रखने में आंशिक सफलता जरूर मिली लेकिन युवाओं के बीच नाराजगी बढ़ने की रिपोर्ट भी सामने आई। गुमराह युवकों को भारत विरोधी अभियान में शामिल करने के लिए तमाम तरह के लालच दिए गए, नफरत की दीवार खड़ी करने की कोशिश की गई। यह रिपोर्ट सरकार को चिंता में डालने वाली थी। इसके बाद ही लोगों तक खासकर युवाओं तक नए रुख से पहुंचने की कोशिश के तहत राजनाथ सिंह ने कश्मीर का दौरा किया। 

 
इस दौरान तमाम पक्षों से बात कर राजनाथ ने संकेत दिया कि अगर सकारात्मक रुख दिखता है तो वह खुले मन से बातचीत का रास्ता खोलने को तैयार हैं। सरकार ने रमजान के बाद भी संघर्ष विराम बढ़ाने के संकेत दिए। वह भी तब जब सरकार की पहल के बाद भी वहां हिंसा रुकी नहीं है। जानकारों के अनुसार इसका कितना असर होगा अभी यह कहना मुश्किल है लेकिन बातचीत के लिए बुनियाद खड़ी करना अभी सबसे पहले और प्राथमिक जरूरत थी, जिसे राजनाथ सिंह के दौरे ने पूरा किया। 

घाटी-दिल्ली की दूरी कम करनी है 
दरअसल, राजनाथ सिंह के रुख में बदलाव और घाटी जाकर विश्वास के रिश्ते को मजबूत करने की पहल के पीछे दिल्ली और घाटी के बीच बढ़ी दूरी को भी कम करना है। हाल के दिनों में जम्मू-कश्मीर की सीएम महबूबा मुफ्ती से लेकर तमाम राजनीतिक दलों ने शिकायत की थी कि जिस तरह दिल्ली में घाटी के मामले पर भड़काऊ बयान दिए जाते हैं, उनसे हालत सुधरने की बजाय और बिगड़ते हैं। 

 
सरकार की ओर से नियुक्त वार्ताकार ने भी इस बात से सहमति जताते हुए इस दूरी को कम करने के लिए सरकार से पहल करने को कहा था। साथ ही खुफिया रिपोर्ट भी सामने आई थी कि घाटी में युवाओं को सरकार की नीतियों के प्रति भड़का कर उन्हें आतंक की दुनिया में शामिल करने का अभियान चलाया जा रहा। सूत्रों के अनुसार सरकार की सबसे बड़ी चिंता थी कि उसकी सख्त नीति का कश्मीर में गलत संदेश जा रहा है। राजनाथ के घाटी दौरे के बाद सरकार की मंशा है कि आम कश्मीरियों तक संदेश जाए कि वह कश्मीर और कश्मीरियत दोनों के साथ है। 

फिर भी कई चुनौतियां बाकी 
जानकारों के मुताबिक, इसके बाद भी कई चुनौतियां हैं। हुर्रियत और अलगाववादी नेताओं के खिलाफ कानूनी केस दर्ज किए जा चुके हैं। एनएआई और ईडी जैसे केंद्रीय एजेंसी इन मामलों की जांच भी कर रही है। सीमा पार से आतंकवाद जारी है। इनके बीच सरकार किस तरह बीच का रास्ता अपनाएगी, अभी यह देखना होगा। साथ ही सेना को विश्वास में लेना भी सरकार की प्राथमिकता में है। जाहिर है, राजनाथ सिंह के लिए इसमें संतुलन बनाना आसान नहीं होगा। 

Source : Agency