स्मार्टफोन के बिना नींद नहीं आती, थोड़ी देर फोन से दूर रहने पर आप भी बेचैन होने लगते हैं और बहुत अलग-थलग महसूस करते हैं तो आपके लिए यह किसी खतरे से कम नहीं है. क्योंकि ज्यादा फोन इस्तेमाल करने वाले लोग अकेलापन, उदासी और चिंता का शिकार हो सकते हैं. इस बात का खुलासा एक रिसर्च में हुआ है. रिसर्च के मुताबिक, जो लोग स्मार्टफोन का अधिक उपयोग करते हैं, वे लगातार गतिविधियों के बीच फोन में खो जाते हैं और अपना ध्यान केंद्रित नहीं रख पाते. इस तरह की लत हमें मानसिक रूप से थका देती है और आराम नहीं करने देती. अगर आपको भी स्मार्टफोन के बिना नींद नहीं आती, थोड़ी देर फोन से दूर रहने पर आप भी बेचैन होने लगते हैं और बहुत अलग-थलग महसूस करते हैं तो आपके लिए यह किसी खतरे से कम नहीं है. क्योंकि ज्यादा फोन इस्तेमाल करने वाले लोग अकेलापन, उदासी और चिंता का शिकार हो सकते हैं. इस बात का खुलासा एक रिसर्च में हुआ है. रिसर्च के मुताबिक, जो लोग स्मार्टफोन का अधिक उपयोग करते हैं, वे लगातार गतिविधियों के बीच फोन में खो जाते हैं और अपना ध्यान केंद्रित नहीं रख पाते. इस तरह की लत हमें मानसिक रूप से थका देती है और आराम नहीं करने देती.

अगर आपको भी स्मार्टफोन के बिना नींद नहीं आती, थोड़ी देर फोन से दूर रहने पर आप भी बेचैन होने लगते हैं और बहुत अलग-थलग महसूस करते हैं तो आपके लिए यह किसी खतरे से कम नहीं है. क्योंकि ज्यादा फोन इस्तेमाल करने वाले लोग अकेलापन, उदासी और चिंता का शिकार हो सकते हैं. इस बात का खुलासा एक रिसर्च में हुआ है. रिसर्च के मुताबिक, जो लोग स्मार्टफोन का अधिक उपयोग करते हैं, वे लगातार गतिविधियों के बीच फोन में खो जाते हैं और अपना ध्यान केंद्रित नहीं रख पाते. इस तरह की लत हमें मानसिक रूप से थका देती है और आराम नहीं करने देती.

हार्ट केयर फाउंडेशन (एचसीएफआई) के अध्यक्ष डॉ. के.के. अग्रवाल ने कहा, "हमारे फोन और कंप्यूटर पर आने वाले नोटिफिकेशन, वाइब्रेशन और अन्य अलर्ट हमें लगातार स्क्रीन की ओर देखने के लिए मजबूर करते हैं. शोध के मुताबिक, यह अलर्टनेस कुछ वैसी ही प्रतिक्रिया का परिणाम है जैसा कि किसी खतरे के समय या हमले के समय प्रतीत होता है." उन्होंने कहा, "इसका मतलब यह है कि हमारा मस्तिष्क लगातार सक्रिय और सतर्क रहता है, जो कि इसकी स्वस्थ कार्य प्रणाली के अनुरूप नहीं है. हम लगातार उस गतिविधि की तलाश करते हैं और उसकी अनुपस्थिति में रेस्टलेस, एक्साइटेड और लोनली फील करते हैं"


डॉ. अग्रवाल ने कहा, "यदि हमें 30 मिनट तक कोई कॉल ना आए तो चिंता होने लगती है. करीब 30 प्रतिशत मोबाइल यूजर्स में यह समस्या होती है. फैंटम रिंगिंग 20 से 30 प्रतिशत मोबाइल यूजर्स में मौजूद होती है. आपको ऐसा महसूस होता है कि आपका फोन बज रहा है और आप बार-बार उसे चेक करते हैं, जबकि ऐसा सच में होता नहीं है."


रिसर्च के मुताबिक, सोशल मीडिया टेक्नोलॉजी की लत सोशल लाइफ पर निगेटिव इम्पैक्ट डाल सकती है. इसके जरिए होने वाला कम्यूनिकेशन आधा-अधूरा होता है और इसे फेस-टू-फेस कम्यूनिकेशन का विकल्प नहीं माना जा सकता. इसमें शरीर की भाषा और अन्य रिश्तों की गरमाहट का अभाव होता है. इसमें कहा गया है कि 30 प्रतिशत मामलों में स्मार्टफोन माता-पिता के बीच झगड़े का कारण भी बनता है. मोबाइल अधिक यूज करने वाले बच्चे अक्सर देर से उठते हैं और स्कूल जाने के लिए तैयार नहीं होते हैं. औसतन, लोग सोने से पहले स्मार्ट फोन के साथ बिस्तर में 30 से 60 मिनट बिताते हैं.

डॉ. अग्रवाल ने बताया, "गैजेट्स के माध्यम से जानकारी प्राप्त करने के कारण मस्तिष्क के ग्रे मैटर में कमी आती है, जोकि संज्ञान और भावनात्मक नियंत्रण के लिए जिम्मेदार होता है. इस डिजिटल युग में, अच्छे स्वास्थ्य की कुंजी है संयम. हममें से अधिकांश लोग ऐसे उपकरणों के दास बन गए हैं, जो वास्तव में हमें फ्रीडम प्रदान करने के लिए थे और हमें जीवन का अनुभव प्रदान करने और लोगों के साथ रहने और अधिक समय बिताने के लिए बनाए गए थे. हम अपने बच्चों को भी उसी गलत रास्ते पर ले जा रहे हैं."


उन्होंने इससे बचाव का सुझाव देते हुए कहा, "इलेक्ट्रॉनिक कर्फ्यू का मतलब है सोने से 30 मिनट पहले किसी भी इलेक्ट्रॉनिक गैजेट का उपयोग न करना. हर तीन महीने में सात दिनों के लिए फेसबुक से अवकाश लें. सप्ताह में एक बार पूरे दिन सोशल मीडिया के इस्तेमाल से बचें. मोबाइल का उपयोग केवल जरूरी बात करने के लिए करें. दिन में तीन घंटे से अधिक समय तक कंप्यूटर का उपयोग न करें."


डॉ. ने कहा, "अपने मोबाइल टॉकटाइम को दिन में दो घंटे से अधिक समय तक सीमित करें. दिन में एक से अधिक बार अपनी मोबाइल बैटरी रिचार्ज न करें. अस्पताल के सेटअप में मोबाइल भी संक्रमण का स्रोत हो सकता है, इसलिए, इसे हर रोज कीटाणु रहित करना आवश्यक है."

Source : Agency