आज साल का पहला त्योहार है लोहड़ी और दिल्लीवाले इसे सेलिब्रेट करने के लिए पूरी तरह से तैयार हैं। दिल्ली में पलूशन लेवल इन दिनों कम हो गया है लेकिन लोहड़ी वाले दिन अगर बड़े पैमाने पर लकड़ी जला दी जाती है तो इससे इन्वाइरनमेंट प्रदूषित हो जाएगा और इससे नुकसान भी काफी हो सकता है। इसलिए इस बार खुशियों के फेस्टिवल लोहड़ी को लोगों ने ट्रेंडी तरीके से सेलिब्रेट करने का प्लान किया है। लोहड़ी के ग्रैंड सेलिब्रेशन को 'ग्रीन लोहड़ी' और इन्वाइरनमेंट फ्रेंडली लोहड़ी के रूप में लोग सेलिब्रेट करने वाले हैं।

सर्दी...ठंडी हवाएं...और बॉनफायर...लोहड़ी के फेस्टिवल को वॉर्म वेलकम देती है। लेकिन इन खुशियों के पलों में हम भूल जाते हैं कि लकड़ियां जलाने से उठे धुएं के कारण हमारा वातावरण कितना प्रदूषित हो रहा है। वैसे भी दिल्ली में पंजाबियों की संख्या काफी ज्यादा है और ऊपर से इस फेस्टिवल को हर कोई मनाता है, इसलिए समय के साथ-साथ इस त्योहार में भी बदलाव हो रहा है और इस माहौल में लोहड़ी को अब ग्रीन और इकोफ्रेंडली बनाया जा रहा है। इन्वाइरनमेंट एक्सपर्ट्स का भी मानना है कि हमें त्योहार मनाने के नए तरीके सोचने होंगे ताकि हमारी खुशियां भी बनीं रहे और वातावरण भी खराब ना हो...

ऐसे में अगर हम कम संख्या में लकड़ी जलाएं तो इससे धुआं भी कम होगा और पेड़ भी कम काटे जाएंगे। दोनों तरीकों से वातावरण को ही फायदा मिलेगा। लोहड़ी के दिन हम एक साथ मिलकर ग्रुप में बॉनफायर करें तो इससे त्योहार का महत्व भी बना रहेगा और पहले की तरह सब लोग एक साथ इकट्ठे भी होंगे। इससे लोहड़ी के मौके पर लगने वाली रौनक और मस्ती का अलग ही मजा होगा।

पहली लोहड़ी का जश्न
ऐसा माना जाता है कि जिस घर में नई शादी हुई हो, शादी की पहली वर्षगांठ हो या संतान का जन्म हुआ हो, वहां तो लोहड़ी बड़े ही जोरदार तरीके से मनाई जाती है। लोहड़ी के दिन कुंवारी लड़कियां रंग-बिरंगे नए-नए कपड़े पहनकर घर-घर जाकर लोहड़ी मांगती हैं। माना जाता है कि पौष में सर्दी से बचने के लिए लोग आग जलाकर सुकून पाते हैं और लोहड़ी के गाने भी गाते हैं। इसमें बच्चे, बूढ़े सभी स्वर से स्वर और ताल से ताल मिलाकर नाचने लगते हैं। साथ ही ढोल की थाप के साथ गिद्दा और भांगड़ा भी किया जाता है।

पुरानी और नई मान्यताओं का संगम
पिछले कई सालों से लोहड़ी का त्योहार मना रहीं पवन बताती हैं कि इस पर्व का महत्व ही यही है कि बड़े बुजुर्गों के साथ उत्सव मनाते हुए नई पीढ़ी के बच्चे अपनी पुरानी मान्याताओं और रीती-रिवाजों का ज्ञान हासिल करते रहें, ताकि भविष्य में भी पीढ़ी-दर-पीढ़ी यह उत्सव ऐसे ही चलता रहे।

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