नई दिल्ली/ अहमदाबाद 

गुजरात में बीजेपी सरकार ने प्रदूषण कम करने और केरोसीन की काला बाजारी को रोकने के लिए प्रदेश को केरोसीन मुक्त बनाने की पहल की थी। इसका असर पार्टी को विधानसभा चुनावों में उठाना पड़ा। समुद्री तट से सटे इलाके वाले क्षेत्रों में बीजेपी की सीटें घटने की वजह है कि मछली पालन के व्यवसाय से जुड़े लोग 'केरोसीन मुक्त' गुजरात की पहल से नाराज थे।
 

नैशनल ग्रीन ट्राइब्यूनल ने गुजरात के समुद्री क्षेत्रों में रेत-खनन पर रोक लगाई। इस रोक के कारण भवन निर्माण में लगने वाली सामग्री की कीमत काफी बढ़ गई और इस दिशा में बीजेपी सरकार की तरफ से कोई सकारात्मक कोशिश नहीं हुई। इस वजह से बीजेपी के खिलाफ राज्य में थोड़ा नकारात्मक माहौल भी बना और पार्टी को इसका नुकसान कम सीट के तौर पर झेलना पड़ा। 

 
पार्टी के आंतरिक सर्वे में यह बात सामने आई है कि बीजेपी + के जीत के अंतर को कम करने की वजह सिर्फ शहरी और ग्रामीण क्षेत्र का अंतर नहीं है। इसके पीछे कई और छोटे-छोटे कारण भी जिम्मेदार हैं। आंतरिक सर्वे में यह बात भी सामने आई है कि बीजेपी की तरफ से चुनाव प्रचार की कमान खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी + ने संभाली जिसका असर भी मतदाताओं पर पड़ा। हालांकि, पार्टी भी यह बात स्वीकार कर रही है कि मोदी के गुजरात छोड़ने के बादे से पार्टी की स्थिति पहले जैसी नहीं रही है। 

2019 लोकसभा चुनावों को देखते हुए पार्टी इन सभी कमजोरियों पर विचार कर इन्हें दूर करने की कोशिश कर रही है। मछली पालन के व्यवसाय से जुड़े लोग बोट की मशीनों में केरोसीन को मिलाकर प्रयोग करते हैं। केरोसीन के स्थान पर डीजल सेट वाले इंजन लगाने को लेकर सरकार के फैसले को तय समय में वापस नहीं लिया जा सका। 

 
किसानों की नाराजगी न्यूनतम समर्थन मूल्य को लेकर थी और पार्टी के प्रदर्शन में इस पहलू ने भी बड़ी भूमिका निभाई। बीजेपी के पदाधिकारियों का मानना है कि किसान कर्ज को लेकर ज्यादा परेशान नहीं थे, लेकिन अच्छी पैदावार के बाद जब फसल बाजार में पहुंची तब तक प्रदेश में कोड ऑफ कंडक्ट लागू किया जा चुका था। समर्थन मूल्य या फिर किसानों को मदद पहुंचाने वाली कोई और घोषणा आचार संहिता लागू होने के कारण नहीं कर सकी। 

बीजेपी के कुछ नेताओं ने भी हमारे सहयोगी अखबार टाइम्स ऑफ इंडिया के सामने स्वीकार किया कि किसान समुदाय गुजरात में बीजेपी के ही साथ रहा है। सस्ती दरों पर बिजली और कम ब्याज दरों पर ऋण ऐसे मुद्दे रहे, जिन पर किसानों की अपेक्षाएं सरकार पूरी करने में नाकाम रही। 

 
पार्टी के प्रदर्शन का मूल्यांकन कर रही बीजेपी की कोर टीम बुजुर्ग नेताओं की वोट अपील और चुनाव प्रचार के प्रभावों का भी आकलन कर रही है। पार्टी को ऐसी रिपोर्ट भी मिल रही है कि गुजरात के युवा वोटरों को लुभाने में पार्टी के बुजुर्ग नेता नाकाम रहे हैं। युवा अपने जैसा कोई तेज-तर्रार युवा चेहरे को नेतृत्व करते देखना चाहते हैं। गुजरात बीजेपी में बुजुर्ग नेताओं का दखल है और इस कारण नए नेतृत्व को उभरने का ज्यादा अवसर नहीं मिल रहा है। 
 

Source : Agency