बलं बलवतां चाहं कामरागविवॢजतम्।
धर्माविरुद्धो भूतेषु कामोस्मि भरतर्षभ।। —गीता 7/21

बलम्, बलवताम्, च, अहम्, कामरागविवर्जितम्,
धर्माविरुद्ध:, भूतेषु काम:, अस्मि, भरतर्षभ।।

भावार्थ: हे भरत श्रेष्ठ! मैं बलवानों का आसक्ति तथा कामना रहित बल अर्थात सामर्थ्य हूं और सब प्राणियों में धर्म के अनुकूल अर्थात शास्त्र अनुकूल काम हूं।

श्री भगवान कहते हैं कि बलवानों का बल मैं हूं। अर्थात किसी भी क्षेत्र में किसी के पास जो सामर्थ्य है, वह उन्हीं की दी हुई है। बात बिल्कुल स्पष्ट है- शारीरिक बल या क्षमता देखें। शरीर की बनावट या संचालन स्थिति इसके पीछे कौन? हाड़-मांस-चमड़ी अपने आप में न चल सकते हैं, न सुन बोल सकते हैं, न ही कुछ और कर सकते हैं। थोड़ा और गहराई से देखें-गहरी नींद में जब हमें यह भी आभास नहीं रहता कि शरीर किस करवट में है- उस समय भीतर की संपूर्ण व्यवस्था कौन चला रहा होता है? निश्चित, नि:संदेह वही चेतना शक्ति, जो सबमें समान रूप से है।

इसका स्पष्ट संकेत यह है कि बल सामर्थ्य आदि भगवत कृपा शक्ति की ही देन है। इसका उपयोग केवल अपने स्वार्थ, निजी लाभ, अहम-आसक्ति आदि की तुष्टि-पुष्टि तक ही न हो। धन, सामर्थ्य, बल, क्षमता आदि सब कुछ यहीं छूटने वाला है; लेकिन ईश्वरीय भाव से इनका परहित में सदुपयोग एक अमर प्रेरणा बन जाता है।

इसलिए हमारे ऋषि कहते हैं कि सामर्थ्यवान वह नहीं, जिसके पास बहुत सामर्थ्य है, सच्चा सामर्थ्यवान तो वह है जो इसका सदुपयोग करता है। विद्वान वह नहीं, जिसके पास बहुत विद्या है; वह है जो दूसरों को भी पढ़ाकर निरक्षर से साक्षर बनाए।

धनवान केवल वह नहीं, जिसके पास बहुत धन है; असली धनवान वह है, जो निर्धन, असहाय, रोगी, दुखी को सहारा दे और बलवान वह जो अपने बल से गिरे हुए को उठाए।

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