बॉलिवुड में सुरों के बेताज बादशाह मोहम्मद रफी का 24 दिसंबर 2017 को 93वां जन्मदिन है। रफी का जन्म 24 दिसंबर 1924 को पंजाब के कोटला सुल्तान सिंह गांव में हुआ था। रफी को बचपन से ही संगीत से लगाव था। आगे उन्होंने संगीत की शिक्षा ली और हिंदी फिल्म इंडस्ट्री के सबसे सफल गायकों में से एक बने। आगे की स्लाइड्स में जानें, मोहम्मदी रफी के बारे में कुछ अनजाने फैक्ट्स...

शुरुआती जीवन
मोहम्मद रफी के 6 भाई थे। उनका घर का नाम 'फीको' था। उनके भाई की गांव में नाई की दुकान थी। शुरुआत में वह अपने गांव के फकीर के गाने सुना करते थे और उनकी नकल करते थे। उन्होंने उस्ताद अब्दुल वाहिद खान, पंडित जीवन लाल और फिरोज निजामी से शास्त्रीय संगीत की शिक्षा ली थी। उन्होंने पहली बार 13 साल की उम्र में पहली बार स्टेज पर गाना गाया था जिसके बाद श्याम सुंदर ने उन्हें फिल्मों में गाने के लिए प्रेरित किया।

हिंदी फिल्मों में शुरुआत
मोहम्मद रफी ने 1944 में पंजाबी फिल्म गुल बलोच से गाने की प्लेबैक सिंगिंग की शुरुआता की थी। इसके बाद उन्होंने ऑल इंडिया रेडियो के लाहौर स्टेशन पर गाना शुरू कर दिया। इसके बाद रफी मुंबई आ गए और हिंदी फिल्मों में गाने लगे। रफी ने हिंदी फिल्म के लिए पहला गाना फिल्म 'गांव की गोरी' में गाया था। इसके बाद यह सिलसिला जारी रहा। रफी ने अपने दौर के हर संगीतकार के साथ काम किया।

बहुमुखी प्रतिभा के धनी सिंगर
मोहम्मद रफी ने अपने सिंगिंग करियर में हर मूड के गीत गाए हैं। वह गाने के मूड के हिसाब से अपनी आवाज बदल लिया करते थे। उन्होंने 'चाहे कोई मुझे जंगली कहे' जैसे गानों से लेकर अनेक क्लासिकल, भजन, गजल, कव्वाली और रुमानी गाने भी गाए हैं।

क्लासिकल संगीत को नई ऊंचाई तक पहुंचाया
मोहम्मद रफी उन बिरले गायकों में थे जिन्हें संगीत की बहुत गहरी समझ थी। हालांकि यह समझ उनके पहले और साथ गा रहे दूसरे गायकों में भी थी और क्लासिकल म्यूजिक को फिल्मी संगीत में बहुत अच्छी तरह मिला कर के. एल. सहगल ने पेश भी किया, लेकिन जो बात रफी को सहगल से अलग करती है, वह यह है कि ऐसा करते हुए सहगल जितना क्लासिकल म्यूजिक की शुद्धता की तरफ झुके, वहीं रफी ने क्लासिकल म्यूजिक का पॉप्युलर फिल्मी म्यूजिक से बहुत सहज और आत्मीय रिश्ता जोड़ दिया। नतीजा यह हुआ कि तमाम रागों पर आधारित होने और शास्त्रीय संगीत का ध्यान रखने के बावजूद रफी उसे बहुत लोकप्रिय बना गए।

कई भाषाओं में गाए गीत
ऐसा माना जाता है कि मोहम्मद रफी ने लगभग साढ़े 7 हजार से ज्यादा गाने गाए। उन्होंने हिंदी के अलावा भोजपुरी, कोंकणी, उड़िया, पंजाबी, बांग्ला, मराठी, सिंधी, कन्नड़, गुजराती, तेलुगू, मगही, मैथिली, उर्दू, अंग्रेजी, फारसी, अरबी, सिंहली और डच भाषाओं में गाने गाए थे।

हार्ट अटैक से हुई मौत
मोहम्मद रफी की मौत 31 जुलाई 1980 को 55 साल की उम्र में हार्ट अटैक से हुई थी। उन्होंने अपनी मौत से कुछ घंटे पहले ही अपना आखिरी गाना फिल्म 'आस पास' के लिए रिकॉर्ड किया था।

गूगल ने किया सलाम
मोहम्मद रफी के 93वें जन्मदिन के मौके पर गूगल ने भी डूडल बनाकर इस महान गायक को सलाम किया है। आज भी मोहम्मद रफी के चाहने वालों की संख्या लाखों-करोड़ों में है। रफी संगीत प्रेमियों के दिल में हमेशा जिंदा रहेंगे।

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