शिक्षक ने बीआरसी, बीएसी पर अपनी शिक्षक पत्नी से 10 हजार रु. वसूलने का लगाया आरोप

हटा विकासखंड के शिक्षा विभाग में उस समय हड़कंप मच गया, जब मिडिल स्कूल दपुर में पदस्थ अध्यापक ध्रुव गोस्वामी ने एक पत्र सोशल मीडिया पर वायरल कर दिया, जिसमें आरोप लगाया कि मिडिल स्कूल हिनोता में पदस्थ उनकी सहायक अध्यापक प|ी सुधा गोस्वामी से बीआरसी टीआर कारपेंटर एवं बीएसी जाकेश परेता ने निरीक्षण के स्पष्टीकरण के निराकरण होने के नाम पर 10 हजार रुपए वसूल किए। जिसके कारण उनका परिवार तनाव में है और कुछ घटना घटित होती है तो दोनों ही जवाबदार होंगे।

पत्र में हिनोता संकुल के एक बाबू पूरनलाल यादव पर भी बार-बार वेतन वृद्धि रोक देने की धमकी दिए जाने से परेशान होने का आरोप लगाया गया है। पत्र के वायरल होते ही लोगों को वाकये पर विश्वास करते देर नहीं लगी क्योंकि कुछ खामियों के कारण कोई शिक्षक शिकायत भले ही न करें, लेकिन इस तरह का खेल विभागीय तौर पर लंबे समय से चल रहा है।

बीआरसी के अलावा जिस बीएसी पर यह आरोप लगाया गया है उनके पास प्राइवेट स्कूलों की मान्यता का प्रभार भी है और जिस तरह से गली कूंचों में खुल रहे प्राइवेट स्कूलों को मान्यता मिल रही है वह किसी से छुपी नहीं है। लेकिन वायरल पत्र पर विभाग कुछ कार्रवाई करता इसके कुछ ही घंटों में आरोप लगाने वाले शिक्षक की सहायक अध्यापक प|ी सुधा गोस्वामी ने एक पत्र सोशल मीडिया पर वायरल करते हुए जिला शिक्षाधिकारी को लेख किया है कि उनके पति मानसिक रूप से बीमार हैं और पिछले कुछ समय से उनका नागपुर में इलाज चल रहा है।

पत्र में शारीरिक बीमारी की नहीं बल्कि मानसिक बीमारी की बात कही गई है

पत्र में 10 हजार रुपए के लेनदेन का भी खंडन किया गया है। प|ी के बाद शिक्षक के पिता ने भी अपने पुत्र को मानसिक रूप से बीमार बताते हुए उसके द्वारा लिखे पत्र पर गौर न किए जाने की बात लेख की है। यह सभी पत्र सोशल मीडिया पर वायरल होते ही अब चर्चा छिड़ गई। किसी ने शिक्षक की प|ी और पिता के पत्र को बी आर सी की पावर पॉलिटिक्स और समन्वय का प्रयास बताया तो किसी ने शिकायत पर परिजनों के ही विरोध को सफल अभियान की बधाई दे डाली। सवाल यह उठता है कि शिक्षा विभाग के वरिष्ठ अधिकारी इस मामले में क्या संज्ञान लेते हैं क्योंकि यदि शिक्षक की प|ी और पिता का यकीन किया जाए, तो उसका परीक्षण किया जाकर सत्यता पाए जाने पर उसे विभाग से बाहर का रास्ता दिखाया जा सकता है, क्योंकि यहां किसी प्रकार की शारीरिक बीमारी की नहीं बल्कि मानसिक बीमारी की बात कही गई है, जो कभी भी विद्यार्थियों के हिसाब से सही नहीं है।

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